भाद्रपदशुक्लचतुर्दश्यां दिवा क्रियते। चतुर्दश दर्भान् द्वौ द्वौ संयोज्य अग्रे ग्रन्थिं कृत्वा त्रिधा विभज्य वेणीवत् ग्रथित्वा सप्तफणं अनन्तं कृत्वा यमुनाकलशोपरि संस्थाप्य प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात्। चतुर्दशग्रन्थियुतं दोरकं पूजान्ते दक्षिणभुजे बध्नीयात्। ब्राह्मणसुवासिनीभोजनं च।
पूर्वाङ्गपूजा. इदं पूर्वाङ्गं सर्वासु पूजासु समानम् — आदौ आचर्य पश्चात् प्रधानपूजां कुर्यात्। पूर्वाङ्गपूजा
पूर्वाङ्गपूजा
संवृणु
आचमनम्
ध्यानम्
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
प्राणायामः — सङ्कल्पः
अप उपस्पृश्य
ममोपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं करिष्यमाणस्य कर्मणः निर्विघ्नेन परिसमाप्त्यर्थं आदौ विघ्नेश्वरपूजां करिष्ये।
महद्भन्दनम्
आब्रह्मलोकादारोहात् आलोकात् लोकपर्वतात्।
ये वसन्ति द्विजा देवास्तेभ्यो नित्यं नमो नमः ॥
आसनपूजा
पृथिव्या मेरुपृष्ठ ऋषिः। सुतलं छन्दः। कूर्मो देवता। आसने विनियोगः।
पृथिवि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं चासनं कुरु ॥
घण्टापूजा
घण्टानादं कृत्वा।
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु रक्षसाम्।
घण्टारवं करोम्यादौ देवताह्वानकारणम् ॥
विघ्नेश्वरपूजा
अस्मिन् हरिद्राबिम्बे श्रीविघ्नेश्वरं ध्यायामि।
आवाहयामि। आसनं समर्पयामि। पादयोः पाद्यं समर्पयामि। अर्घ्यं समर्पयामि। आचमनीयं समर्पयामि। मधुपर्कं समर्पयामि। स्नानं समर्पयामि। आचमनीयं समर्पयामि। वस्त्रं समर्पयामि। उपवीतं समर्पयामि। दिव्यपरिमलगन्धान् धारयामि। अक्षतान् समर्पयामि। पुष्पैः पूजयामि।
| सुमुखाय नमः |
| एकदन्ताय नमः |
| कपिलाय नमः |
| गजकर्णिकाय नमः |
| लम्बोदराय नमः |
| विकटाय नमः |
| विघ्नराजाय नमः |
| विनायकाय नमः |
| धूमकेतवे नमः |
| गणाध्यक्षाय नमः |
| फालचन्द्राय नमः |
| गजाननाय नमः |
| वक्रतुण्डाय नमः |
| शूर्पकर्णाय नमः |
| हेरम्बाय नमः |
| स्कन्दपूर्वजाय नमः |
| सिद्धिविनायकाय नमः |
| श्रीमहागणपतये नमः |
उपचाराः
धूपमाघ्रापयामि। दीपं दर्शयामि। निवेदयामि। कर्पूरनीराजनं दर्शयामि। समस्तोपचारपूजां समर्पयामि।
प्रार्थना
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
इति प्रार्थ्य। प्राणायामः।
सङ्कल्पः
शुभे शोभने मुहूर्ते आद्यब्रह्मणः द्वितीयपराधे श्वेतवराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमे पादे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे मेरोर्दक्षिणे पार्श्वे शकाब्दे अस्मिन् वर्तमाने व्यावहारिके प्रभवादिषष्टिसंवत्सराणां मध्ये …… नाम संवत्सरे …… अयने …… ऋतौ …… मासे …… पक्षे …… शुभतिथौ …… वासरयुक्तायां …… नक्षत्रयुक्तायां शुभयोगशुभकरणसकलविशेषणविशिष्टायामस्यां शुभतिथौ ममोपात्तसमस्तदुरितक्षयद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं अनन्तपद्मनाभप्रीत्यर्थं अनन्तव्रतारम्भं करिष्ये।
अप उपस्पृश्य। श्रीविघ्नेश्वराय नमः यथास्थानं प्रतिष्ठापयामि। शोभनार्थे क्षेमाय पुनरागमनाय च। इति विघ्नेश्वरमुद्राम्।
कलशपूजा
कलशं गन्धपुष्पाक्षतैरभ्यर्च्य। कलशजलेन तत्तद्देवतानाम योजयेत्। पूजाद्रव्याणि आत्मानं च प्रोक्ष्य।
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥
| गङ्गायै नमः | |
| यमुनायै नमः | |
| गोदावर्यै नमः | |
| सरस्वत्यै नमः | |
| नर्मदायै नमः | |
| सिन्धवे नमः | |
| कावेर्यै नमः | पुष्पैः पूजयामि। |
शङ्खपूजा
कलशोदकेन शङ्खं पूरयेत्। शङ्खजलेन पूजोपकरणानि द्रव्याणि आत्मानं च त्रिः प्रोक्ष्य, पुनः शङ्खं पूरयेत्।
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे।
देवैश्च पूजितः सर्वैः पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते ॥
आत्मपूजा
देहो देवालयः प्रोक्तो जीवो देवः सनातनः।
त्यजाम्यज्ञाननिर्मूल्यं सोऽहंभावेन पूजये ॥
पीठपूजा
| ओं सकलगुणात्मशक्तियुक्ताय योगपीठाय नमः |
| आधारशक्त्यै नमः |
| मूलप्रकृत्यै नमः |
| आदिवराहाय नमः |
| आदिकूर्माय नमः |
| अनन्ताय नमः |
| पृथिव्यै नमः |
| आदित्यादिनवग्रहदेवताभ्यो नमः |
| दशदिक्पालेभ्यो नमः |
गुरुध्यानम्
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥
श्रीगुरुं ध्यायामि।
प्राणप्रतिष्ठा
प्रतिमासु देवतां ध्यात्वा प्राणप्रतिष्ठां कुर्यात्।
अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामहामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः। ऋग्यजुस्सामाथर्वाणि छन्दांसि। सकलजगत्सृष्टिस्थितिसंहारकारिणी प्राणशक्तिः परा देवता। ओं बीजम्। ह्रीं शक्तिः। क्रों कीलकम्। प्राणप्रतिष्ठायां विनियोगः।
करन्यासः
| ओं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः |
| ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः |
| क्रों मध्यमाभ्यां नमः |
| ओं अनामिकाभ्यां नमः |
| ह्रीं कनिष्ठाभ्यां नमः |
| क्रों करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः |
अङ्गन्यासः
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः। ध्यानम्।
| ओं हृदयाय नमः |
| ह्रीं शिरसे स्वाहा |
| क्रों शिखायै वषट् |
| ओं कवचाय हुम् |
| ह्रीं नेत्रत्रयाय वौषट् |
| क्रों अस्त्राय फट् |
प्राणशक्तिध्यानम्
रक्ताम्भोधिस्यपोतोद्यद्दारुणसरोजाधिरूढा कराम्बुजैः
पाशं कोदण्डमिक्षुं सृणिमपि दधती मण्यङ्कुशं पुष्पबाणान्।
बिभ्राणा सृक्कपालं विमलनखलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या
देवी बाला त्रिनेत्रा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः ॥
तत्त्वोपचाराः
| लं पृथिव्यात्मिकायै | गन्धं समर्पयामि। |
| हं आकाशात्मिकायै | पुष्पैः पूजयामि। |
| यं वाय्वात्मिकायै | धूपमाघ्रापयामि। |
| रं अग्न्यात्मिकायै | दीपं दर्शयामि। |
| वं अमृतात्मिकायै | अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि। |
| सं सर्वात्मिकायै | सर्वोपचारपूजां समर्पयामि। |
जीवस्थापनम्
पञ्चदशसंस्कारार्थं पञ्चदशवारं प्रणवजपं कृत्वा।
ओं ह्रीं क्रों क्रों ह्रीं आं। यं रं लं वं शं षं सं हों। हंससोऽहं सोऽहं हंसः। अस्यां मूर्तौ जीवस्तिष्ठतु। अस्यां मूर्तौ सर्वेन्द्रियाणि मनस्त्वक्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाप्राणवाक्पाणिपादपायूपस्थाख्यानि प्राणापानव्यानोदानसमानाश्चागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ॥
असुं नीते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम्। ज्योक् पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया नः स्वस्ति ॥
आवाहनस्थापनम्
आवाहितो भव। स्थापितो भव। सन्निहितो भव। सन्निरुद्धो भव। अवकुण्ठितो भव। सुप्रीतो भव। सुप्रसन्नो भव। सुमुखो भव। वरदो भव। प्रसीद प्रसीद। स्वामिन् सर्वजगन्नाथ यावत्पूजावसानकम् तावत्त्वं प्रीतिभावेन बिम्बेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥
इति पूर्वाङ्गपूजा।
प्रधानपूजा
ध्यानम्
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥
कुम्भे वरुणावाहनम्
वरुणाय नमः। सकलाराधनैः स्वर्चितम्।
कुम्भे वरुणमावाह्य। कुम्भे यमुनां पूजयामि॥
यमुनाध्यानम्
क्षीरोदार्णवसम्भूते क्षीरवर्णसमप्रभे।
प्रसादं कुरु मे देवि यमुनायै नमो नमः॥
यमुनां ध्यायामि॥
आवाहनम्
विष्णुपादसमुद्भूते सर्वकामप्रदायिनि।
सर्वसौभाग्यदे देवि यमुनायै नमोऽस्तु ते॥
यमुनां आवाहयामि॥
आसनम्
सूर्यपादाब्जसम्भूते सर्वलोकहितप्रिये।
सर्वपापविनिर्मुक्ते तुङ्गायै च नमोऽस्तु ते॥
यमुनायै नमः। आसनं समर्पयामि॥
पाद्यम्
गरुडासनसम्भूते सर्वलक्षणसंयुते।
सर्वव्रते महादेवि भद्रायै च नमोऽस्तु ते॥
यमुनायै नमः। पाद्यं समर्पयामि॥
अर्घ्यम्
कृष्णवेण्यै नमस्तुभ्यं कृष्णवर्णे सुलक्षणे।
विष्णुप्रिये महादेवि भागीरथ्यै नमो नमः॥
यमुनायै नमः। अर्घ्यं समर्पयामि॥
आचमनीयम्
नन्दिपादे नमस्तुभ्यं शङ्करार्धशरीरिणि।
सर्वलोकाधिपे देवि भागीरथ्यै नमो नमः॥
यमुनायै नमः। आचमनीयं समर्पयामि॥
मधुपर्कः
गिरिपादे नमस्तुभ्यं सर्वलक्षणसंयुते।
सर्वप्रदे महादेवि भद्रायै च नमोऽस्तु ते॥
यमुनायै नमः। मधुपर्कं समर्पयामि॥
स्नानम्
सिंहपादे नमस्तुभ्यं नरसिंहसमन्विते।
सर्वलक्षणसम्पूर्णे भवनाशिनि ते नमः॥
यमुनायै नमः। स्नानं समर्पयामि॥
वस्त्रम्
देवानामुत्तमे देवि सूक्ष्मतन्तुविनिर्मितम्।
वस्त्रयुग्मं मया दत्तं गृहाण सुरपूजिते॥
यमुनायै नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥
कञ्चुकम्
गोदावरि नमस्तुभ्यं सर्वाभीष्टप्रदायिनि।
सर्वपापविनिर्मुक्ते वृद्धगङ्गे नमो नमः॥
यमुनायै नमः। कञ्चुकं समर्पयामि॥
आभरणानि
रत्नताटङ्ककटकभूषणानि रविप्रभे।
ददामि ते रविसुते सर्वैश्वर्यप्रदायिनि॥
यमुनायै नमः। आभरणानि समर्पयामि॥
गन्धः
चन्दनागरुकर्पूरगोरोचनसमन्वितम्।
कस्तूर्यादियुतं देवि गन्धं दास्यामि भक्तितः॥
यमुनायै नमः। गन्धं समर्पयामि॥
पुष्पाणि
मन्दारपारिजाताद्यैः केतकीपाटलादिभिः।
त्वां पूजयामि यमुने वरदे भक्तवत्सले॥
यमुनायै नमः। पुष्पाणि समर्पयामि॥
यमुनाङ्गपूजा
| यमुनायै नमः | पादौ पूजयामि। |
| कालिन्द्यै नमः | जानुनी पूजयामि। |
| सूर्यतनयायै नमः | ऊरू पूजयामि। |
| शमनस्वस्रे नमः | कटिं पूजयामि। |
| गङ्गायै नमः | नाभिं पूजयामि। |
| तरङ्गिण्यै नमः | स्तनौ पूजयामि। |
| ह्लादिन्यै नमः | भुजान् पूजयामि। |
| उन्नतकण्ठ्यै नमः | कण्ठं पूजयामि। |
| सरस्वत्यै नमः | मुखं पूजयामि। |
| त्रिलोकजनन्यै नमः | ललाटं पूजयामि। |
| भीमरथ्यै नमः | शिरः पूजयामि। |
| यमुनायै नमः | सर्वाण्यङ्गानि पूजयामि॥ |
धूपदीपौ
यमुनायै नमः। धूपमाघ्रापयामि॥
यमुनायै नमः। दीपं दर्शयामि॥
नैवेद्यम्
सर्वभक्ष्यैश्च भोज्यैश्च रसैः षड्भिः समन्वितम्।
नैवेद्यं गृह्यतां देवि यमुनायै नमोऽस्तु ते॥
यमुनायै नमः। अमृतोपहारं निवेदयामि॥ मध्ये मध्ये अमृतपानीयं समर्पयामि॥ कर्पूरताम्बूलं समर्पयामि॥
नीराजनम्
पञ्चवर्तिसमायुक्तं सर्वमङ्गलकारकम्।
नीराजनं प्रदास्यामि कल्याणं कुरु मङ्गले॥
यमुनायै नमः। कर्पूरनीराजनं दर्शयामि॥
प्रार्थना
क्षीरोदार्णवसम्भूते क्षीरार्णवनिषेविते।
इह भोगान् वरान् देहि परत्र च परां गतिम्॥
यमुनायै नमः। मन्त्रपुष्पं समर्पयामि। प्रदक्षिणनमस्कारान् समर्पयामि।
अनन्तपूजा
यमुनाकलशोपरि सप्तफणान्वितं दर्भमयं अनन्तं संस्थाप्य। प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा॥
अनन्तध्यानम्
ध्यायाम्यनन्तं देवेशं पीतवाससमच्युतम्।
नवाम्रपल्लवनिभं पिङ्गभ्रूश्मश्रुलोचनम्॥
पीताम्बरधरं देवं शङ्खचक्रगदाधरम्।
विश्वाकारं विश्वयोनिं विश्वाधारं हरिं परम्॥
सहस्रशिरसं विष्णुं शेषसंज्ञं रमापतिम्।
अलङ्कृतं समुद्रस्थं विश्वरूपं विभावये॥
अनन्तं ध्यायामि॥
आवाहनम्
आगच्छानन्त देवेश तेजोराशे जगत्पते।
इमां मया कृतां पूजां गृहाण पुरुषोत्तम॥
अनन्तं आवाहयामि॥
आसनम्
विष्टरोऽयं विचित्रात्मन् गोवर्धनधर प्रभो।
अनन्त दीयते तस्मिन् रत्नसिंहासने विश॥
अनन्ताय नमः। आसनं समर्पयामि॥
पाद्यम्
यथा त्वं सर्वदेवानां इन्द्रादीनां च रक्षकः।
तथा मां पालयानन्त त्वदङ्घ्रिशरणागतम्॥
अनन्ताय नमः। पाद्यं समर्पयामि॥
अर्घ्यम्
अनन्तानन्तदेवेश अनन्तफलदायक।
अनन्तानन्दरूपोऽसि गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते॥
अनन्ताय नमः। अर्घ्यं समर्पयामि॥
आचमनीयम्
गङ्गोदकं मयानीतं सुवर्णकलशस्थितम्।
आचम्यतां हृषीकेश प्रसीद पुरुषोत्तम॥
अनन्ताय नमः। आचमनीयं समर्पयामि॥
मधुपर्कः
दधि क्षीरं घृतं चैव शर्करामधुसंयुतम्।
तुष्ट्यर्थं देवदेवेश मधुपर्कं ददामि ते॥
अनन्ताय नमः। मधुपर्कं समर्पयामि॥
स्नानम्
गङ्गादिभ्यः समानीतं शीतलं विमलं जलम्।
स्नानार्थं गृह्यतां देव सर्पराज नमोऽस्तु ते॥
अनन्ताय नमः। स्नानं समर्पयामि॥
वस्त्रम्
तप्तकाञ्चनसङ्काशं पीताम्बरयुगं शुभम्।
गृहाण देवदेवेश लक्ष्मीनाथ नमोऽस्तु ते॥
अनन्ताय नमः। वस्त्रं समर्पयामि॥
उपवीतम्
ब्रह्मसूत्रमिदं शुभ्रं गृहाण पुरुषोत्तम।
दामोदर नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात्॥
अनन्ताय नमः। उपवीतं समर्पयामि॥
गन्धः
गन्धं कुङ्कुमसंयुक्तं कस्तूर्यादिसमन्वितम्।
गृहाणानन्त देवेश गुणरत्नमहार्णव॥
अनन्ताय नमः। गन्धं समर्पयामि॥
पुष्पाणि
मल्लीचम्पकपुन्नागमालत्यादीनि च प्रभो।
मया हृतानि पुष्पाणि स्वीकुरुष्व सदर्चित॥
अनन्ताय नमः। पुष्पाणि समर्पयामि॥
अङ्गपूजा
| अनन्ताय नमः। | पादौ पूजयामि। |
| शेषाय नमः। | गुल्फौ पूजयामि। |
| कालात्मने नमः। | जङ्घे पूजयामि। |
| विश्वरूपाय नमः। | जानुनी पूजयामि। |
| उपमाहीनाय नमः। | ऊरू पूजयामि। |
| कालात्मने नमः। | कटिं पूजयामि। |
| जगन्नाथाय नमः। | गुह्यं पूजयामि। |
| पद्मनाभाय नमः। | नाभिं पूजयामि। |
| सर्वात्मने नमः। | कुक्षिं पूजयामि। |
| श्रीवत्सवते नमः। | वक्षः पूजयामि। |
| चक्रहस्ताय नमः। | हस्तान् पूजयामि। |
| आजानुबाहवे नमः। | बाहून् पूजयामि। |
| वाचस्पतये नमः। | वक्त्रं पूजयामि। |
| केशवाय नमः। | नासिकां पूजयामि। |
| नारायणाय नमः। | नेत्रे पूजयामि। |
| गोविन्दाय नमः। | श्रोत्रे पूजयामि। |
| अनन्तपद्मनाभाय नमः। | शिरः पूजयामि। |
| विष्णवे नमः। | सर्वाण्यङ्गानि पूजयामि॥ |
अवतारनामभिः अङ्गपूजा
| मत्स्याय नमः। | पादौ पूजयामि। |
| कूर्माय नमः। | गुल्फौ पूजयामि। |
| वराहाय नमः। | जानुनी पूजयामि। |
| नारसिंहाय नमः। | ऊरू पूजयामि। |
| वामनाय नमः। | कटिं पूजयामि। |
| भार्गवाय नमः। | उदरं पूजयामि। |
| रामाय नमः। | हृदयं पूजयामि। |
| कृष्णाय नमः। | मुखं पूजयामि। |
| सहस्रशिरसे नमः। | शिरः पूजयामि। |
| श्रीमदनन्ताय नमः। | सर्वाण्यङ्गानि पूजयामि॥ |
अष्टोत्तरशतनामार्चना
अनन्त पद्मनाभ अष्टोत्तरशत नामावलिःपृथक्पृष्ठे पठ
- १ॐ अनन्ताय नमः
- २ॐ पद्मनाभाय नमः
- ३ॐ शेषाय नमः
- ४ॐ सप्तफणान्विताय नमः
- ५ॐ तल्पात्मकाय नमः
- ६ॐ पद्मकराय नमः
- ७ॐ पिङ्गप्रसन्नलोचनाय नमः
- ८ॐ गदाधराय नमः
- ९ॐ चतुर्बाहवे नमः
- १०ॐ शङ्खचक्रधराय नमः
- ११ॐ अव्ययाय नमः
- १२ॐ नवाम्रपल्लवाभासाय नमः
- १३ॐ ब्रह्मसूत्रविराजिताय नमः
- १४ॐ शिलासुपूजिताय नमः
- १५ॐ देवाय नमः
- १६ॐ कौण्डिन्यव्रततोषिताय नमः
- १७ॐ नभस्यशुक्लस्थचतुर्दशीपूज्याय नमः
- १८ॐ फणेश्वराय नमः
- १९ॐ सङ्कर्षणाय नमः
- २०ॐ चित्स्वरूपाय नमः
- २१ॐ सूत्रग्रन्थिसुसंस्थिताय नमः
- २२ॐ कौण्डिन्यवरदाय नमः
- २३ॐ पृथ्वीधारिणे नमः
- २४ॐ पातालनायकाय नमः
- २५ॐ सहस्राक्षाय नमः
- २६ॐ अखिलाधाराय नमः
- २७ॐ सर्वयोगिकृपाकराय नमः
- २८ॐ सहस्रपद्मसम्पूज्याय नमः
- २९ॐ केतकीकुसुमप्रियाय नमः
- ३०ॐ सहस्रबाहवे नमः
- ३१ॐ सहस्रशिरसे नमः
- ३२ॐ श्रितजनप्रियाय नमः
- ३३ॐ भक्तदुःखहराय नमः
- ३४ॐ श्रीमते नमः
- ३५ॐ भवसागरतारकाय नमः
- ३६ॐ यमुनातीरसदृष्टाय नमः
- ३७ॐ सर्वनागेन्द्रवन्दिताय नमः
- ३८ॐ यमुनाराध्यपादाब्जाय नमः
- ३९ॐ युधिष्ठिरसुपूजिताय नमः
- ४०ॐ ध्येयाय नमः
- ४१ॐ विष्णुपर्यङ्काय नमः
- ४२ॐ चक्षुश्रवणवल्लभाय नमः
- ४३ॐ सर्वकामप्रदाय नमः
- ४४ॐ सेव्याय नमः
- ४५ॐ भीमसेनामृतप्रदाय नमः
- ४६ॐ सुरासुरेन्द्रसम्पूज्याय नमः
- ४७ॐ फणामणिविभूषिताय नमः
- ४८ॐ सत्यमूर्तये नमः
- ४९ॐ शुक्लतनवे नमः
- ५०ॐ नीलवाससे नमः
- ५१ॐ जगद्गुरवे नमः
- ५२ॐ अव्यक्तपादाय नमः
- ५३ॐ ब्रह्मण्याय नमः
- ५४ॐ सुब्रह्मण्यनिवासभुवे नमः
- ५५ॐ अनन्तभोगशयनाय नमः
- ५६ॐ दिवाकरमुनीडिताय नमः
- ५७ॐ मधुकवृक्षसंस्थानाय नमः
- ५८ॐ दिवाकरवरप्रदाय नमः
- ५९ॐ दक्षहस्तसदापूज्याय नमः
- ६०ॐ शिवलिङ्गनिविष्टधिये नमः
- ६१ॐ त्रिप्रतीहारसन्दृश्याय नमः
- ६२ॐ मुखदापिपदाम्बुजाय नमः
- ६३ॐ नृसिंहक्षेत्रनिलयाय नमः
- ६४ॐ दुर्गासमन्विताय नमः
- ६५ॐ मत्स्यतीर्थविहारिणे नमः
- ६६ॐ धर्माधर्मादिरूपवते नमः
- ६७ॐ महारोगायुधाय नमः
- ६८ॐ वार्धितीरस्थाय नमः
- ६९ॐ करुणानिधये नमः
- ७०ॐ ताम्रपर्णीपार्श्ववर्तिने नमः
- ७१ॐ धर्मपरायणाय नमः
- ७२ॐ महाकाव्यप्रणेत्रे नमः
- ७३ॐ नागलोकेश्वराय नमः
- ७४ॐ स्वभुवे नमः
- ७५ॐ रत्नसिंहासनासीनाय नमः
- ७६ॐ स्फुरन्मकरकुण्डलाय नमः
- ७७ॐ सहस्रादित्यसङ्काशाय नमः
- ७८ॐ पुराणपुरुषाय नमः
- ७९ॐ ज्वलद्रत्नकिरीटाढ्याय नमः
- ८०ॐ सर्वाभरणभूषिताय नमः
- ८१ॐ नागकन्याष्टतप्रान्ताय नमः
- ८२ॐ दिक्पालकपरिपूजिताय नमः
- ८३ॐ गन्धर्वगानसन्तुष्टाय नमः
- ८४ॐ योगशास्त्रप्रवर्तकाय नमः
- ८५ॐ देववैणिकसम्पूज्याय नमः
- ८६ॐ वैकुण्ठाय नमः
- ८७ॐ सर्वतोमुखाय नमः
- ८८ॐ रत्नाङ्गदलसद्बाहवे नमः
- ८९ॐ बलभद्राय नमः
- ९०ॐ प्रलम्बघ्ने नमः
- ९१ॐ कान्तीकर्षणाय नमः
- ९२ॐ भक्तवत्सलाय नमः
- ९३ॐ रेवतीप्रियाय नमः
- ९४ॐ निराधाराय नमः
- ९५ॐ कपिलाय नमः
- ९६ॐ कामपालाय नमः
- ९७ॐ अच्युताग्रजाय नमः
- ९८ॐ अव्यग्राय नमः
- ९९ॐ बलदेवाय नमः
- १००ॐ महाबलाय नमः
- १०१ॐ अजाय नमः
- १०२ॐ वाताशनाधीशाय नमः
- १०३ॐ महातेजसे नमः
- १०४ॐ निरञ्जनाय नमः
- १०५ॐ सर्वलोकप्रतापनाय नमः
- १०६ॐ सज्वालप्रलयाग्निमुखे नमः
- १०७ॐ सर्वलोकैकसंहर्त्रे नमः
- १०८ॐ सर्वेष्टार्थप्रदायकाय नमः
ग्रन्थिपूजा
ततो देवाग्रे चतुर्दशग्रन्थियुतं सूत्रं संस्थाप्य ग्रन्थिपूजां कुर्यात्॥
| श्रियै नमः। | प्रथमग्रन्थिं पूजयामि। |
| मोहिन्यै नमः। | द्वितीयग्रन्थिं पूजयामि। |
| महाबलायै नमः। | तृतीयग्रन्थिं पूजयामि। |
| अजयायै नमः। | चतुर्थग्रन्थिं पूजयामि। |
| मङ्गलायै नमः। | पञ्चमग्रन्थिं पूजयामि। |
| शुभायै नमः। | षष्ठग्रन्थिं पूजयामि। |
| जयायै नमः। | सप्तमग्रन्थिं पूजयामि। |
| विजयायै नमः। | अष्टमग्रन्थिं पूजयामि। |
| जयन्त्यै नमः। | नवमग्रन्थिं पूजयामि। |
| पापनाशिन्यै नमः। | दशमग्रन्थिं पूजयामि। |
| विश्वरूपायै नमः। | एकादशग्रन्थिं पूजयामि। |
| सर्वमङ्गलायै नमः। | द्वादशग्रन्थिं पूजयामि। |
| महनीयायै नमः। | त्रयोदशग्रन्थिं पूजयामि। |
| महालक्ष्म्यै नमः। | चतुर्दशग्रन्थिं पूजयामि॥ |
धूपः
दशाङ्गो गुग्गुलूपेतः सुगन्धः सुमनोहरः।
आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥
अनन्ताय नमः। धूपं समर्पयामि। आचमनीयं समर्पयामि।
दीपः
साज्यं त्रिवर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
गृहाण मङ्गलं दीपं त्रैलोक्यतिमिरापहम् ॥
अनन्ताय नमः। दीपं समर्पयामि। आचमनीयं समर्पयामि।
नैवेद्यम्
अन्नं चतुर्विधं सूपफलभक्ष्यसमन्वितम्।
दधिमध्वाज्यसंयुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
अनन्ताय नमः। अमृतं महानैवेद्यं समर्पयामि। मध्ये मध्ये पानीयं समर्पयामि। आचमनीयं समर्पयामि।
ताम्बूलम्
पूगीफलसमायुक्तं नागवल्लीदलैर्युतम्।
कर्पूरचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
अनन्ताय नमः। कर्पूरताम्बूलं समर्पयामि।
नीराजनम्
चन्द्रादित्यौ च नक्षत्रं विद्युदग्निस्त्वमेव च।
त्वमेव सर्वज्योतींषि कुर्यां नीराजनं तव ॥
अनन्ताय नमः। सर्वमङ्गलप्राप्त्यर्थं सर्वापराधक्षमापणार्थं कर्पूरनीराजनं दर्शयामि। आचमनीयं समर्पयामि।
पुष्पाञ्जलिः
मन्दारनीलोत्पलकुन्दजातीपुन्नागमल्लीकरवीरपङ्कजैः।
पुष्पाञ्जलिं बिल्वदलैस्तुलस्या देव त्वदंघ्रौ विनिवेशयामि ॥
अनन्ताय नमः। मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।
दोरनमस्कारः
(दोरं नमस्कृत्य)
अनन्ताय नमस्तुभ्यं सहस्रशिरसे नमः।
नमोऽस्तु पद्मनाभाय नागानां पतये नमः॥
दोरग्रहणम्
(सूत्रं हस्ते गृहीत्वा)
अनन्तः कामदः श्रीमाननन्त्यं मे प्रयच्छतु।
अनन्तो दोररूपेण पुत्रपौत्रान् प्रवर्धयेत्॥
प्रार्थना
अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।
अनन्तरूपो वस मे करे त्वमनन्तसूत्राय नमो नमस्ते॥
दोरबन्धनम्
संसारगह्वरगुहासु सुखं विहर्तुं वाञ्छन्ति ये कुरुकुलोद्भव शुद्धसत्त्वाः।
संपूज्य च त्रिभुवनेशमनन्तदेवं बध्नन्ति दक्षिणकरे वरदोरकं ते॥
(इति दक्षिणभुजे दोरं बद्ध्वा)
जीर्णदोरविसर्जनम्
नमः सर्वहितानन्त जगदानन्दकारक।
जीर्णदोरं वासुदेव विसृजामि त्वदाज्ञया॥
(इति जीर्णदोरं विसृज्य)
ब्राह्मणपूजा — उपायनदानम्
उपायनमिदं विप्र सफलं दक्षिणायुतम्।
गृहाण करुणासिन्धुः प्रीयतां च जनार्दनः॥
अनन्तः प्रतिगृह्णीयादनन्तो वै ददाति च।
अनन्तस्तारयेद्द्वाभ्यामनन्ताय नमो नमः॥
तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु॥
(इत्युपायनं दत्त्वा) जीर्णदोरं च ब्राह्मणाय दत्त्वा।