| 2 |
1 |
कृष्णोस्याखरेष्ठोऽग्नये त्वा |
| 2 |
2 |
अदित्यै व्युन्दनमसि |
| 2 |
3 |
भुवपतये स्वाहा |
| 2 |
4 |
यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिळ |
| 2 |
5 |
वीतिहोत्र त्वा |
| 2 |
6 |
समिदसि सूर्यस्त्वा |
| 2 |
7 |
ऊर्ण म्रदस |
| 2 |
8 |
घृताच्यसि जुहूर्नाम |
| 2 |
9 |
ध्रुवा असदन्नृतस्य |
| 2 |
10 |
अग्ने वाजजिद्वाज |
| 2 |
11 |
अस्कन्नमद्याज्य देवेभ्य |
| 2 |
12 |
वसुमतीमग्ने ते |
| 2 |
13 |
अग्ने वेर्होत्र |
| 2 |
14 |
स्विष्टकृद्देवेभ्य इन्द्र |
| 2 |
15 |
अत्र पितरो |
| 2 |
16 |
उपहूता पृथिवी |
| 2 |
17 |
उपहूतो द्यौष्पितोप |
| 2 |
18 |
मयीदमिन्द्र इन्द्रिय |
| 2 |
19 |
देव सवितरेत |
| 2 |
20 |
मनो गायत्र्यै |
| 2 |
21 |
ब्रहस्पतिर्देवाना ब्रह्माह |
| 2 |
22 |
मित्रस्य त्वा |
| 2 |
23 |
आददेऽग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि |
| 2 |
24 |
स्वाहाकृत जठरामिन्द्रस्य |
| 2 |
25 |
इन्द्रस्य त्वा |
| 2 |
26 |
प्राणापानौ मे |
| 2 |
27 |
एषा ते |
| 2 |
28 |
एतत् ते |
| 2 |
29 |
मनोज्योतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिम |
| 2 |
30 |
अग्नीषोमयोरुज्जितिमनूज्जेष वाजस्य |
| 2 |
31 |
वसुभ्यस्त्वा रुद्रेभ्यस्त्वादित्येभ्यस्त्वा |
| 2 |
32 |
व्यन्तु वयोरिप्तो |
| 2 |
33 |
चक्षुष्पा असि |
| 2 |
34 |
त त |
| 2 |
35 |
स स्रवभागा |
| 2 |
36 |
अग्नेऽदब्धायोऽशीतम पाहि |
| 2 |
37 |
अग्नये सवेशपतये |
| 2 |
38 |
उत्प्रुषो विप्रुष |
| 2 |
39 |
देवा गातुविदो |
| 2 |
40 |
सबर्हिरङ्क्ता हविषा |
| 2 |
41 |
कस्त्वा विमुञ्चति |
| 2 |
42 |
वेषोऽस्युपवेषो द्विषतो |
| 2 |
43 |
ऋद्धा कर्मण्या |
| 2 |
44 |
स वर्चसा |
| 2 |
45 |
यज्ञ श |
| 2 |
46 |
दिवि विष्णुर्व्यक्रस्त |
| 2 |
47 |
अस्मादन्नादस्यै प्रतिष्ठाया |
| 2 |
48 |
स्वयभूरसि श्रेष्ठो |
| 2 |
49 |
अग्ने गृहपते |
| 2 |
50 |
अस्थूरि णो |
| 2 |
51 |
उरुविष्णो विक्रमस्वोरुक्षयाय |
| 2 |
52 |
ततोऽसि ततुरस्यनु |
| 2 |
53 |
इद मे |
| 2 |
54 |
अग्नये कव्यवाहनाय |
| 2 |
55 |
ये रूपाणि |
| 2 |
56 |
अत्र पितरो |
| 2 |
57 |
नमो व |
| 2 |
58 |
उदायुषा स्वायुषोत्पर्जन्यस्य |
| 2 |
59 |
आधत्त पितरो |
| 2 |
60 |
ऊर्ज वहन्तीरमृत |