Prapāṭhaka 38 — Anuvāka sūcī
Prapāṭhaka 5 (chapter 38) {#chapter-38}
Section titled “Prapāṭhaka 5 (chapter 38) {#chapter-38}”| Prapāṭhaka | Anuvāka | First Words |
|---|---|---|
| 38 | 1 | १ इन्द्रो |
| 38 | 1 | इतीन्द्रियमेव पुन |
| 38 | 2 | ६ आयुर्वा |
| 38 | 2 | धृवस्तस्मादेव यज्ञस्यैकान्न |
| 38 | 3 | ९ यज्ञेन |
| 38 | 3 | को जीवन्ति |
| 38 | 4 | १३ सुवर्गाय |
| 38 | 4 | तस्मादसावादित्यस्त्रिृशच्च |
| 38 | 5 | १५ इन्द्रो |
| 38 | 5 | प्रथमेनाऽगृह्णीत |
| 38 | 6 | १८ अदिति |
| 38 | 6 | एव यज्ञाज्जरायु |
| 38 | 7 | २३ अन्तर्यामपात्रेण |
| 38 | 7 | विश्वे प्र |
| 38 | 8 | २६ प्राणो |
| 38 | 8 | पत्नी सुवर्गमुपस्तितरमिन्द्रियाव |
| 38 | 9 | ३२ इन्द्रो |
| 38 | 9 | अश्रीणादन्तराधानाभ्यामल्पा स्थापयन्ति |
| 38 | 10 | ३६ ग्रहान् |
| 38 | 10 | यथा पिता |
| 38 | 11 | ३९ प्रान्यानि |
| 38 | 11 | भवन्ति यानि |