अध्ययनम्
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तै॰ब्रा॰ २.७.१४
प्र॒जाप॑तिः प॒शून॑सृजत।
ते᳚ऽस्माथ्सृ॒ष्टाः परां᳚ च आयन्।
तान॑ग्निष्टो॒मेन॒ नाऽऽप्नो᳚त्।
तानु॒क्थ्ये॑न॒ नाऽऽप्नो᳚त्।
तान्थ्षो॑ड॒शिना॒ नाऽऽप्नो᳚त्।
तान्रात्रि॑या॒ नाऽऽप्नो᳚त्।
तान्थ्स॒न्धिना॒ नाऽऽप्नो᳚त्।
सो᳚ऽग्निम॑ब्रवीत्।
इ॒मान्म॑ ई॒फ्सेति॑।
तान॒ग्निस्त्रि॒वृता॒ स्तोमे॑न॒ नाऽऽप्नो᳚त्॥४६॥
स इन्द्र॑मब्रवीत्।
इ॒मान्म॑ ई॒फ्सेति॑।
तानिन्द्रः॑ पञ्चद॒शेन॒ स्तोमे॑न॒ नाऽऽप्नो᳚त्।
स विश्वा᳚न्दे॒वान॑ब्रवीत्।
इ॒मान्म॑ ईफ्स॒तेति॑।
तान् विश्वे॑दे॒वाः स॑प्तद॒शेन॒ स्तोमे॑न॒ नाऽऽप्नु॑वन्।
स विष्णु॑मब्रवीत्।
इ॒मान्म॑ ई॒फ्सेति॑।
तान् विष्णु॑रेकवि॒ꣳ॒शेन॒ स्तोमे॑नाऽऽप्नोत्।
वा॒र॒व॒न्तीये॑नावारयत॥४७॥
इ॒दं विष्णु॒र्वि च॑क्रम॒ इति॒ व्य॑क्रमत।
यस्मा᳚त्प॒शवः॒ प्रप्रेव॒ भ्रꣳशे॑रन्।
स ए॒तेन॑ यजेत।
यदाप्नो᳚त्।
तद॒प्तोर्याम॑स्याप्तोर्याम॒त्वम्।
ए॒तेन॒ वै दे॒वा जैत्वा॑नि जि॒त्वा।
यं काम॒मका॑मयन्त॒ तमा᳚ऽऽप्नुवन्।
यं कामं॑ का॒मय॑ते।
तमे॒तेना᳚ऽऽप्नोति॥४८॥ ॥TB 2.7.14॥
॥१॥